लंबी-छोटी प्रतिक्रियाएँ

'साहित्य वैभव' एक सुन्दर और परिपक्व प्रकाशन लगा। चित्रकला, फोटोग्राफी और मुद्रण आदि में जिसे कहा जाता है जो इसमें उत्कृष्टï है। यह एक सच्चाई है, औपचारिकता नहीं है। मैं यह भी मानता हूॅं कि आप भी अपनी पत्रिका को सजाने-सँवारने में पूरी कल्पना लगा देते होंगे। कभी आपसे मिला नहीं हूँ अत: आपके व्यक्तित्व को जानने का अवसर नहीं आया- साहित्य वैभव के माध्यम से जानने का अवसर एक उपलब्धि है। नक्सलवाद और उससे जुड़े विचारों से अवगत होने के लिए सदैव सजग रहा हूँ और यह भी जानता हूँ कि चारू मजुमदार ने यह आन्दोलन क्यों चलाया- चारू का उद्देश्य था जो धनाढ्ïय लोग हैं वे हमें एक म$जदूर के रूप में ही अपनाते हैं और कुछ नहीं, शोषण कर चोकर को फेंक देते हैं। चारू की मृत्यु अदालत ले जाते समय हो गई, हम सब मौन रहे। उस आन्दोलन को कुछ तथाकथित असामाजिक और विदेशी तत्वों ने अपने हाथ में ले लिया ओर बंगाल को आग में झोंक दिया जो कालान्तर में सारे देश में फैल गया जो निश्चित ही विदेशी तत्वों का भारत को कम$जोर करने का एक मन्तव्य है।

मैं आपके सम्पादकीय का समर्थन करता हूँ, नेहरू ने एक बार कहा था, हम बाहरी श्क्तियों से सामना तो कर लेते हैं किन्तु देश के अन्दर छुपे दुश्मनों से कैसे लड़ें।

प्रवीरचन्द्र भंजदेव को किस प्रकार मारा गया और उसे मारने के लिए उस समय के मुख्यमंत्री और उस समय की सरकार और सत्ता में बैठी सरकार का पूरा विवरण उसी समय सरिता (दिल्ली प्रेस) ने एक विशेषांक निकाला था। सम्भव है मेरे संग्रह में हो, कभी मिला तो विवरण दूँगा।दुष्यंत कुमार को सब लोग त्यागी कहा करते थे, मैं दुष्यंत कुमार कहा करता था और आज यह स्थिति है सारे समाज में त्यागी शब्द का लोप हो गया है। उनके जीवन के अधिकांश छायाचित्र मेरे खींचे हुए हैं। टाइम्स ऑफ इंण्डिया के प्रकाशन ''सारिकाÓÓ जो पहले सुचित्रा के नाम से प्रकाशित हुई थी में देखा जा सकता है। दुष्यंत कुमार ने जो यह कविता लिखी थी एक दस्तावेज है अपने आप को व्यवस्था के विरुद्घ बोलने के लिए आगे आने का। बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि सत्ता लोलुप समाज के लोग उनकी कविताओं का अर्थ शासन तक पहुँचाते रहे।

- नवल जायसवाल, प्रेमन, बी 201, सर्वधर्म, कोलार रोड, भोपाल-462042

पत्रिका का आमुख सज्जा एवं भीतर के पृष्ठïों पर रेखाचित्रों का प्रयोग अच्छा हुआ है। एक-दो रेखाचित्र कहानियों में भी देना चाहिए था। गिरीश बख्शी की कहानी 'बदलावÓ एक प्रेरक रचना है। सकारात्मक सोच को उजागर करती यह कहानी बूढ़े व्यक्ति की बेहतरी के लिए आवश्यक संदेश दे जाती है। संपादकीय के तहत दुष्यंत कुमार की कविता पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया। आपके विचारों को रेखांकित करती है उनकी कविता। हिंदी को अपाहिज समझनेवालों के लिए डॉ. रवि शर्मा द्वारा लिखा गया लेख हिन्दी अपनाइये महत्वपूर्ण लगा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के कारागर जैसे संस्मरण प्रत्येक अंक में दें। कविताओं के चयन में थोड़ी सतर्कता बरतें। वैसे केशव दिव्य, नीलिमा कौशल, स्निग्धा की कविता एवं मुकुंद की $ग$जलें प्रभावित करती हैं। साहित्यिक समाचारों को कुछ कम करे, एक साहित्यिक भेंटवार्ता परिचर्चा भी प्रकाशित करें। आपने लघुकथा को स्थान देना आरंभ किया है, धन्यवाद लघु पत्रिकाओं के बीच 'साहित्य वैभवÓ अपना अलग पहचान बना रही है।

-सिद्घेश्वर, अवसर प्रकाशन, पोस्ट बॉक्स नं. 205, करविगहिया, पटना- 800001 (बिहार)  read more »

सप्रे साहित्य का पुनर्जन्म : आशा की किरण

पं. माधवराव सप्रे चमत्कृत लेखक थे। सन् १९०० के आसपास जब हिन्दी गद्य युवा सपने संजो रहा था, तब इतना सुन्दर, लालित्यपूर्ण और संदर्भ-पूर्ण लेखन हिन्दी के लिए वरदान ही तो था। पं. सप्रे जैसे युवा न केवल हिन्दी अपितु राष्ट्र के भी निर्माता हैं। हिन्दी-अस्मिता के ज्वाल से समूचा भारतीय साहित्य प्रकाशित हो उठा। मराठी का चिंतनशील और विवेकपूर्ण साहित्य अनूदित होकर सप्रेजी के लालित्य से हिंदी-संसार पहुँचा। गीता-रहस्य, दास-बोध और महाभारत मीमांसा जैसे बड़े तथा भारतीय संस्कृति को पल्लवित करने वाले ग्रंथों की हिन्दी में तत्काल आवश्यकता थी। सप्रेजी ने तिलकजी का मान बढ़ाया। हिन्दी के गौरव में श्रीवृद्धि की। वस्तुत: सप्रेजी एक कुशल अनुवादक थे। भारतीय अनुवाद साहित्य में उनके अतुलनीय योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। अकेले दासबोध की लोकप्रियता सप्रेजी को वर्षों अमर रखेगी।

हिन्दी की पहली कहानी हो, या समालोचना के प्रथम चरण सप्रेजी के खाते में यह सब दर्ज रहेगा। उनका चिन्तन होता संसार और मनुष्य को बेहतर एवं स्वस्थ बनाने की कला ने उन्हें आज भी आम आदमी का लेखक बनाए रखा है।

यह अंक सप्रेजी की साधना एवं छत्तीसगढ़ के लिए उनकी सार्थक कल्पना को समर्पित है। सप्रेजी का सपना सच हुआ है लेकिन हम आज अनुवाद-कला, कहानी कला और समालोचना की सप्रे परंपरा से दूर हो चले हैं। सप्रे-साहित्य का पुनर्जन्म वर्तमान हिंदी-साहित्य को नवीन एवं पाठक सापेक्ष मार्ग की ओर प्रशस्त कर सकता है।

च्छत्तीसगढ़-मित्रज् एक सौ आठ बरस का हो चुका है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की भरपूर फसल लहलहा रही है। ऐसे में कुछ खरपतवार भी उग आए हैं। पेंड्रारोड की घुमावदार सडक़ों और प्रकृति-संपन्नता के मध्य जिस पत्रकारिता का जन्म हुआ है, वह अब भव्य राजधानी, शापिंग माल, और ऊँची सत्ता के गलियारे में पसर रही है।  read more »

विस्मृत सप्रेजी

शरद कुमार श्रीवास्तव

जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व महान होता है, जो अपना सारा जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित कर देता है वह सभी के लिए पूज्य होता है। ऐसे महापुरुषों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना समूचे राष्टï्र का कर्तव्य हो जाता है परन्तु जिस स्थान विशेष को उस महापुरुष की जन्मभूमि या निवास स्थान होने का गौरव प्राप्त हो उसका कर्तव्य अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक होता है। स्वर्गीय माधवराव जी सप्रे का जीवन सच्चे राष्ट्र हितैषी और कर्मठ व्यक्ति के रूप में हमेशा-हमेशा के लिए स्मरणीय है। ऐसे महान पुरुष का निवास स्थान यह रायपुर ही था, यह समस्त रायपुर निवासियों के लिए गर्व की बात है। विचार यह करना है कि ऐसा गौरव लूटने वाले रायपुर ने सप्रेजी के लिए क्या किया?

यह माधवराव सप्रे नगर पालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है। सन् 1952 से 1956 तक मैं वहां का नियमित विद्यार्थी रहा तथा मैंने सन् 1956 में वहीं से हायर सेकेंडरी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की।

विद्यालय में प्रतिवर्ष एक बड़ा वार्षिकोत्सव तो होता ही था - समय-समय पर माह में कई बार छोटे-बड़े कार्यक्रम भी होते रहते थे। मुझे यह स्वीकार करने में लज्जा मालूम होती है, कि सात वर्षों की अवधि में कभी भी, किसी ïभी व्यक्ति के द्वारा सप्रेजी के नाम का स्मरण नहीं किया गया। वहां से निकलने के बाद लगभग एक वर्ष के बाद तक मैं थोड़ा भी न जानता था कि सप्रेजी कौन थे तथा इस विद्यालय के साथ उनका नाम जोडऩे का क्या तात्पर्य था।

जुलाई 1960 के आसपास भाई शंकर प्रसाद श्रीवास्तव ने रायपुर में ‘‘श्री सप्रे स्मारक साहित्य समिति’’ के गठन का प्रयत्न किया और बड़े परिश्रम के साथ अच्छे ढंग से उक्त समिति का निर्माण हुआ।  read more »

एक सौ दो वर्ष पूर्व पेंड्रा में चमकी थी पत्रकारिता की मशाल

शोषणमुक्त छत्तीसगढ़ के स्वप्नदृष्टा माधवराव सप्रे

केयूरभूषण

छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के जनक पं. माधवराव सप्रे की 132वीं जयंती पहली बार समारोहपूर्वक आज मनाई जा रही है। सप्रेजी छत्तीसगढ़ को शोषण और पीड़ा से मुक्त देखना चाहते थे।

छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण, छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसे विकसित करने की जिम्मेदारी इस अंचल की संपूर्ण जनता के साथ ही यहां के सभी मूर्धन्य नेताओं की है। उन्हें यह भी जानकारी रखनी चाहिए कि यहां की जनता ऐसा छत्तीसगढ़ चाहती है जो सुखी समृद्ध और शोषणमुक्त हो ताकि वह राष्टï्र के समग्र विकास में अपना भी योगदान दे सके। वस्तुत: छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की नींव, आज से एक शताब्दी पूर्व सन् 1900 मेंं पं. माधवराव सप्रे ने ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नामक पत्रिका प्रकाशित करके रखी थी। उनकी कल्पना के छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण आज की पीढ़ी को करना है। इसके लिए ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के प्रवेशांक का संपादकीय प्रेरक हो सकता है।

सप्रे जी जिस अंचल में निवास करते थे उसके प्रति समर्पित थे। इस अंचल के शोषितजनों की पीड़ा उनके हृदय को विचलित कर रही थी। वह उनमें पुरुषार्थ जागृत करके उन्हें पीड़ामुक्त देखना चाहते थे। इसके पीछे उनकी किसी भी प्रकार की कोई निजी लालसा नहीं थी। न वे इस अंचल का नेतृत्व करना चाहते थे, और न ही किसी प्रकार का कोई व्यक्तिगत लाभ उठाना चाहते थे। इस अंचल में राष्टï्रीय जागरण के बीज अंकुरित करने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। मराठी भाषा तथा अंग्रेजी एवं संस्कृत के विद्वान होने के बाद भी रचनाधर्मिता के लिए उन्होंने हिन्दी को अपनाया। जब पं. सुंदरलाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ में दानलीला की रचना की, तब इस अंचल के ही नहीं, देश के अनेक हिन्दी के विद्वानों में खलबली मच गई।  read more »

हिन्दी के समालोचकों द्वारा भुला दिए गए

पहले समालोचक : माधवराव सप्रे
सुशील कुमार त्रिवेदी

दोष किसका है, कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन स्थिति यही है कि एक मराठी भाषी जीवन भर निष्ठïा तथा एकाग्रता से हिन्दी की सेवा करता रहा, और हिंदी के इतिहासकारों ने उसे भुला दिया। जिस व्यक्ति ने हिंदी में समालोचना-लेखन की परंपरा की नींव डाली, सशक्त निबंधों की रचना की और कई महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, उसी व्यक्ति पं. माधवराव सप्रे का नाम पंडित रामचंद्र शुक्ल और उनके ग्रंथ को आधार बना कर ‘नकल नवीस इतिहासकार’ बनने वालों को याद नहीं रहा, यह एक भूल है या साहित्य-इतिहासकारों की साधन-दरिद्रता है?

पिछड़े इलाके का अगुआ

मध्यप्रदेश, जो आज भी पिछड़ा माना जाता है, उसी का एक और पिछड़ा इलाका छत्तीसगढ़ सप्रेजी की कर्मभूमि रहा, इसी क्षेत्र में उन्होंने आज से लगभग 75 वर्ष पूर्व हिन्दी आंदोलन शुरू किया था। उन्हें छत्तीसगढ़ की सोंधी मिट्टïी से इतना ममत्व था, इतना अनुराग था कि उन्होंने अपने साहित्यिक मासिक पत्र का नाम ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ रखा। यह वही छत्तीसगढ़ मित्र है जिसमें सबसे पहली बार हिंदी ग्रंथों की समालोचना प्रकाशित हुई। बनती संवरती रूप लेती हिन्दी में प्रकाशित होने वाले पहले ग्रंथों की पहली समालोचना को लिखने वाले सप्रे जी ही थे।

पेंड्रा (जिला-बिलासपुर) के राजकुमारों को पढ़ाने से मिलने वाले वेतन में से पैसा बचाकर सप्रे जी ने जनवरी 1900 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन आरंभ किया। पं. श्रीधर पाठक, जिन्हें आचार्य शुक्ल ने ‘सच्चे स्वच्छंदतावाद का प्रवत्र्तक’ माना है, की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों,- ऊजड़ ग्राम, एकांतवासी योगी, जगत सचाई सार, धन-विजय, गुïणवंत हेमंत तथा अन्य, की विस्तृत विश्लेषणात्मक और विवेचनात्मक वैज्ञानिक समालोचना इसी पत्र में पहली बार प्रकाशित हुई। इसी प्रकार मिश्रबंधु तथा पं. कामता प्रसाद गुरु आदि तत्कालीन महत्वपूर्ण साहित्यकारों की कृतियों की समालोचना सप्रे जी ने ही लिखी। इसके अतिरिक्त पं. महावीर प्रसाद मिश्र, पं. कामता प्रसाद गुरु, पं. गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, पं. श्रीधर पाठक आदि की रचनाएं प्राय: ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित होती रही।

कुछ वर्ष पूर्व एक ख्याति प्राप्त कहानी-मासिक (सारिका) पत्रिका में एक परिचर्चा प्रकाशित हुई, जिसमें माधवराव सप्रे द्वारा लिखित ‘एक टोकरी भर मिट्टïी’ को हिंदी की पहली मौलिक कहानी बताया गया था। यह कहानी ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में सन् 1901 में प्रकाशित हुई थी।

अर्थाभाव के कारण ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ का प्रकाशन दिसंबर, 1902 में बंद हो गया, पहले एक साल तक इसका मुद्रण रायपुर कैयूमी प्रेस में हुआ, किंतु बाद में यह नागपुर के देशसेवक प्रेस में मुद्रित होता था।  read more »

सप्रेजी के जीवन की आधारशिलाएं

सप्रे जी के समग्र जीवन पर एक विहंगम दृष्टिï डालने से ऐसा लगता है कि उन पर तीन महानुभावों के जीवन-दर्शन का पूर्ण प्रभाव पड़ा था। वे तीन महानुभाव थे विष्णुशास्त्री चिपुलणकर, बाल गंगाधर तिलक और गोपाल गणेश आगरकर। इनमें से चिपलुणकर तो हाई स्कूल की अध्यापकी छोडक़र मराठी भाषा की सेवा में हो गए और इसी उद्देश्य से मराठी भाषा में एक निबंध माला का प्रकाशन करने लगे। उन्होंने मराठी भाषा को प्राणवान बनाने के लिए अथक प्रयत्न किया और स्वदेश प्रेम की भावना भरने के लिए चोटी की पसीना एड़ी तक बहने दिया। दूसरे दो सज्जन-तिलक और आगरकर, चिपलुणकर के घनिष्ठï सहयोगी थे और देश के प्रति कर्तव्य पालन में ही अपने जीवन की सार्थकता मानते थे।

इस त्रिमूर्ति ने जिस प्रकार स्वार्थ का त्याग कर अविश्रांत परिश्रम करके मराठी भाषा को ओजस्वी, सामथ्र्यवान और संपन्न बनाया उसी प्रकार राष्टï्रभाषा हिंदी को भी सशक्त और सर्वगुण संपन्न, दोष रहित बनाना आवश्यक है- यह संकल्प सप्रे जी ने मन ही मन कर लिया। उन्होंने अपनी कार्य प्रणाली की रूपरेखा भी उसी अवसर पर निश्चित कर ली कि पहले बी.ए. तक शिक्षण प्राप्त कर डिग्री प्राप्त कर ली जाए जिससे उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता मिले और कोई रुकावट न हो। वे चाहने लगे कि शिक्षा का निवियोग निरपेक्ष सेवा में हो, कोई बदला पाने की भावना न रहे। इससे उन्हें जो सुख मिलेगा वही सच्चा सुख है और सुख प्राप्त करना ही प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य रहता है।

सप्रे जी की अभिलाषा : सप्रे जी ने हिंदी भाषा के संबंध में अपने संकल्प को सन् 1924 में देहरादून में आयोजित अखिल भारत हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति के आसन से इस प्रकार प्रकट किया था- ‘‘मेरे हृदय में राष्टï्रभाषा का भाव पैदा हुआ- अनुभव किया कि इस विशाल देश में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे सब प्रांतों के लोग अपनी राष्टï्रभाषा मानें और वह हिंदी भाषा को छोडक़र अन्य कोई नहीं है। मैं महाराष्ट्रीय हूं परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। मैं चाहता हूं कि इस राष्टï्रभाषा के सामने भारत वर्ष का प्रत्येक व्यक्ति वह यह भूल जाए कि मैं महाराष्टï्रीयन हूं, बंगाली हूं, गुजराती हूं या मदरासी हूं। ये मेरे पैंतीस वर्षों के विचार हैं और तभी से मैंने इस बात का निश्चय कर लिया है कि मैं आजीवन हिंदी भाषा की सेवा करते रहूंगा। मैं राष्ट्रभाषा को अपने जीवन में ही सर्वोच्च आसन पर विराजमान देखने का अभिलाषी हूं। ’’  read more »

भाइयों में आज सुनाऊं, सप्रेजी की अमर कहानी

माधवराव के नाम से जुड़ी, हिंदी की यह जन्मकहानी
19 जून 1871 का पिथौरा में जन्म हुआ
कोडोपंत जी ने बच्चे को माधवराव नाम दिया
ओल्ड सी पी एंड बेरार में हिंदी सूर्य का उदय हुआ
1881 में माधव का दाखला अंग्रेजी स्कूल में हुआ
मिडिल में सर्वोच्च 7 रु. छात्रवृत्ति थी पानी
भाइयों मैं आज सुनाऊं, सप्रेजी की अमर कहानी
भारतियों को तब अंग्रेजी पढ़ाते दास बनाने को
लोग भी बच्चों को भेजते, भविष्य बनाने को
1890 में माधव ने एन्ट्रेस पास कर वजीफा पाया
साथ ही 18 वर्ष की आयु विवाह बंधन में पाया

1896 में उनके इंटर पास की खबर थी आनी
सुना रहा हूं, क्रमवार, सप्रेजी की अमर कहानी
कलकत्ते में जाकर ली, 1898 में बी ए की उपाधि
आकर हिंदी की सेवा में लग गया माधव
प्रथम हिंदी कहानी का लेखक कहाया माधव
सन 1900 की जनवरी में, पेंडरा के मासिक की कहानी
सुन लीजिए छत्तीसगढ़ मित्र के जन्म की कहानी
हर अंक विविधता पूïर्ण, कहानी थी कविता थी
लेख था, जीवन थी, पुस्तक समीक्षा भी थी
सब विधा युक्त था, संपादक सप्रेजी थे
छत्तीसगढ़ मित्र को तीन वर्ष सम्हाले सप्रेजी थे।

1906 में हिंदी ग्रंथमाला के प्रकाशन की ठानी
सुना रहा हूं, क्रमवार सप्रेजी की अमर कहानी
बाल गंगाधर तिलक का केसरी मराठी में था
पूरे भारत में विचार फैलाने हिंदी करना जरुरी था
1907 में नागपुर से हिंदी में केसरी प्रारंभ हुआ
इसी कारण लल्ली प्रसाद पांडेय जी से संपर्क हुआ
केसरी के अनुवादक को जेल की हवा थी खानी
1908 के समय की है यह सप्रेजी की अमर कहानी
मराठी के अद्भूत ग्रंथों का अनुवाद किया  read more »

पद्माकर के काव्य में संयोग

संयोग और वियोग के अवसरों पर मानसिक आकर्षण अनेक प्रकार के रूपों, भंगिमाओं, चे,्टाओं, वाचिक और शारीरिक विकारों, मानसिक दशाओं आदि में प्रस्फुटित होता है। संयोग के अवसर पर आल्हादजन्य शारीरिक आकर्षण जिन मानसिक विकारों की सृष्टि करना है वे अनुभूतिशील, सूक्ष्म हृदयस्पर्शी और प्रभावोत्पादक नहीं होते जितने वियोग के अवसर पर प्रकट होने वाले मानसिक व्यापार। संपूर्ण चराचर में दुख का व्यापार जितना व्यापक और मर्मस्पर्शी होता है, उतना सूख का नहीं।

संयोग श्रृंगार के अवसर पर कवि परंपरा से चले आते हुए रूढ़ वर्णनों के सहारे जिनमें सूरति, वट् ऋतु वर्णन, विहार, मद्यपान क्रीड़ा अष्टयाम आदि सम्मिलित है, रात्रिकालीन कवि प्रेम चित्र खड़ा करते हुए दिखाई पड़ते हैं। संयोग में बहिरि-प्रिय का सन्निकर्ष अत्यंत आवश्यक है। दर्शन, श्रवण, स्पर्श और संताप आदि की नींव पर ही संयोग श्रंृगार का महल खड़ा होता है। वियोगावस्था की भांति संयोगवस्था में चिंतन, ध्यान, स्मरण आदि की स्थिति नहीं आ पाती। इस अवस्था में प्रिय का सामिप्य स्वयं इतना आल्हादक और उद्रेक पूर्ण होता है कि प्रेमी अपनी समग्रता में वहीं केंद्रीभूत हो जाता है।

शांतिकाल के कवियों में नायकनायिकाओं के सूरत विहार, मद्यपान तथा हाव-भाव इत्यादि चेष्टाओं के आकर्षक और रंगीन चित्र अधिकता से मिलते हैं। डा. ब्रजकिशोर सिंह लिखते हैं कि इन कवियों ने नारी को समाज की स्वतंत्र इकाई मानकर केवल मात्र उपभोग के रूप में स्वीकार किया है। वह जीवन के उदात्त आदर्शों के प्रति प्रेरित करने वाली शक्ति नहीं है, वह तो केवल कामुकता की श्रीवृद्धि करने का एक साधन है। इसकी समस्त क्रियाएं एवं चेष्टाए कुत्सित काम-भाव की ओर इंगित करती हैं। वह श्रद्धा की पात्र नहीं, त्याग की मूर्ति नहीं। वह तोकेवल अपने हाव-भाव से प्रेमी के हृदय में काम संचार करने वाली दरबार की किन्नरी है।इसके व्यक्तित्व का गौरव पुरुष के सुख-भोग के साधन से अधिक और क्या था?  read more »

पद्माकर के काव्य में अध्यात्म और इसका स्वरूप

पद्माकर के काव्य में अध्यात्म

जब श्रद्धावान मनुष्य इंद्रीय विग्रह तथा ज्ञान प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है तब इसे ब्रम्ह मात्मैक्य रूप ज्ञान का अनुभव होता है, जिससे उसे अविलंब पूर्ण शांति उपलब्ध होती है।
निर्गुण ब्रम्ह उपासक कबीर का कथन है कि माया के पास में पड़े हुए जीव का उद्धार केवल भगवद् भक्ति से ही नहीं हो सकता है। भक्ति के बिना माया जति संशय का दुख दूर नहीं हो सकता और न मुक्ति ही मिल सकती है। भाव भक्ति के निा भव सागर से पार जाना असंभव है।

कवि पदमाकर ने अपने रस निरूपण संबंधी ग्रंथ जगविदो में केवल नौ रसों को ही स्वीकारा है अर्थात वे भक्ति की महत्ता को स्वीकार करते हुए भी उनकी स्थिति शांत रस के अंर्गत करते हैं।
कवि ने अपने जीवन के अंतिम समय में कुष्ट रोग से अक्रांत होने पर उससे मुक्ति प्राप्ति हेतु गंगालहरी का सृजन किया था, इसीलिए कवि दृढ़ विश्वास के साथ गंगा की शरण में जाने से पूर्व अपने पापों को चुनौती देता हुआ कहता है ए रे दगादार मेरे पातकअपार तोहि, गंगा कछार में पछार धार करिहों।

पाप के इस वर्णन में जो गतिशीलता दिखाई देती है, वहां भक्ति की दृढ़ भावना संबलित है। गंगा के प्रति अपनी अटूट आस्था के कारण कवि स्थान-स्थान पर न केवल पाप की अवहेलना करता चलता है, अपितु स्थान पर समदूतों और उनके मालिक रामराज की उपेक्षा करने तक में उसे कहीं हिचक नहीं होती थी। कवि अन्यत्र कहता है गंगा के तीर तक पहुंचते ही पापों के पुंज लूट जाते हैं। प्रस्तुत छंद से प्रतीत होता है कि पदमाकर ने भक्त का हृदय पाया ता। उनकी भक्ति में गंभीर भावना है। इस भाव की निमग्नता के पूर्व उन्हें स्थायी निर्वेद हो गया था, जिसे प्रेरित होकर उन्होंने पश्चाताप पूर्वक कहा है।

भोग में रोग को पाया संयोग में वियोग को पाया। भोग साधन में काया का क्लेश पाया। वेद पुराण पढकर ज्ञान का अभियान हुआ और शास्त्रार्थ में स्वमत मंडन तथा परमत खंडन के हेतु विवाद में लगा रहा। जीवन ऐसे ही व्यर्थ गया। मैं पदमाकर अखंड आनंद प्रदाता राम का नाम न गाने पाया इसका पश्चाताप है।  read more »

गुरू-वैभव और श्रीरामकृष्ण

गुरू की महिमा, उनका वैभव और मनुष्य जीवन की मुक्ति साधना के पथ में उनके अमूल्य योगदान का जो वर्णन हमें हिन्दू धर्म में मिलता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। बाकी धर्मों में उनके पैगंबर, ईशारदूत या मसीहाओं का उल्लेख है पर व्यक्तिगत स्तर परजिसप्रकार हम अपने गूरुद्वारा दीक्षित होते हैं, गुरूमंत्र ग्रहण करते हैं और गुरू को साक्षात परमेश्वर समझते हैं वैसे और कहीं भी किसी भी धर्म में नहीं है। संत कबीर ने कहा:

गुरू को मानुष जानते ते नर कहिए अधि एवं गुरू गोविंद दोउ एक हैं,गूरु नारायण रूप हैं, क्योंकि वे गोविंद दियो बताय। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा- ‘बंदउं गुरू पद कंज, कृपा सिन्धु नर रूप हरि ईश्वर की कृपा न हो तो सच्चे गुरू नहीं मिलते, मिलते हैं तो ढोंगी और ठग।’ कबीर कहते हैं-

’गुरवा तो सस्नामया, पैसा केर पचास।
रामनाम धन बेचिके शिष्य करन की आस।’

जब कबीर के जमाने में भी ऐसे ढोंगी गुरु होते थे तो आज का तो कहना ही क्या।
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुं संत कहइ सब कोई।
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी कलियुग सोइ ज्ञानी सो बिरागी।

आज ी गोस्वामी जी की बात उतनी ही सच है। उच्चकोचि के संत और गुरू दुर्लभ हैं। जिन्होंने ईश्वर की अनुभूति नहीं की दर्शन नहीं किए वे भी बड़ी संख्या में शिष्य बनाए जा रहे हैं। आए दिन दूरदर्शन और समाचार पत्रों में ऐसे ढोंगियों की कथा उजागर होती रहती है।  read more »

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