गमछा

ठाकुर प्रीतम सिंह रत्‍नेश

यह हिरदेगढ़ का गमछा है।
मजबूती थी पहले तार-तार,
अब हुआ न जाने जार-जार।
कीमत का पाया सदुपयोग,
उपयोगी था, कर पाया नित प्रयोग।
न आह भरी शिकवे ही किये
रगड़ा, धोया, पोंछा, सब काम लिये
यह ग्रीष्म स्वेद षोषक भी है।
सर्दी रक्षक, पोषक भी है।
विद्युत-प्रवाही- योग हुआ।
तीमारदार है यह गमछा,
यानी कि, अच्छा चमचा है।
यह हिरदेगढ़ का गमछा है।

कभी कंधे पर असवार हुआ,
कभी गर्व गले का हार हुआ
मुख मंडल आभा चमकाता,
मक्खी, मच्छर को भी धमकाता।
विश्रामावधि में, ओढ़ा-ढांका,
धूल धांस में बांधा बांका।
सब्जी, सामान, नाज-लाये,
यह बोझ सहे न इतरायें।
हर घड़ी रहा संगी साथी,
प्रिय मित्र हितैषी बहुभांति।
अति व्यवहारिक और सहनशील
क्या लोचलचक लम-लमचा है।
यह हिरदेगढ क़ा गमछा है।

यह इतना है मंगलमय,
बांधी कमर, हुए निर्भय।
श्रम श्रमी श्रेष्ठ है हिम्मतवर
यह साथ न छोड़े एक क्षण भर।
नेता, किसान,या धनी-गरीब,
यह रहता नित सबके करीब।
चुगली, बेमानी, छल-छिद्र कपट,
अटकें-भटकें न कभी निकट।
केवल मानव मन इसका अनुकरणी
गमछा हितकारी त्यागी बहुवर्णी।
सबका प्रिय यह गर्वहीन,
अतिभाव भले ही दुमचा है।
यह हिरदेगढ़ का गमछा है।

1. हिरदेगढ़ - वक्षस्थल, स्थान का नाम भी है
2. लमचा - लम्बा, लचकदार
3. दुमचा - पिछलग्गू, दुमछल्ला