विजेता

डॉ. नीलिमा द्विवेदी

अपूर्वा के कांपते हाथों से फोन का रिसीवर छूटते-छूटते बचा। उधर से भारी भरकम आवाज सुन कर वह घबरा गई। वह सोचने लगी कि रिसीवर नीचे रख दे। दूसरी तरफ से अब भी आवाज आ रही थी।

आखिर हिम्मत उसने हिम्मत की। रिसीवर कानों के आगे ले जा कर उधर से आवाज को सुनने लगी - च्हैलो, आप कौन बोल रहे हैं, आपकी आवाज नहीं आ रही है। जरा जोर से बोलिए ? आप कहां से बोल रहे हैं ? अपूर्वा ने साहस जुटाते हुए दबे-दबे स्वर में पूछा।

मैडम मैं कोनी पुलिस से हवलदार रामसिंह बोल रहा हूँ।
आपको किससे बात करनी है? थानेदारजी नहीं हैं क्या ?
साहब तो राउंड पर गए हैं, मैडम। आप कौन बोल रही हैं ?

देखिए, मैं बिलासपुर से बोल रही हूँ। मैं कुछ देर पहले अपने पति के साथ कोनी की तरफ से निकली हूँ। मैंने रतनपुर और कोनी के बीच एक आदमी को सड़क पर घायल अवस्था में देखा था। मैं तो चाह कर भी उसकी मदद नहीं कर पाई। प्लीज आप जरा इस मामले को देख लें। ज्यादा देर हो गई तो वह मर जाएगा।

आप कौन बोल रही हैं, मैडम?

देखिए, आपको मेरे नाम से क्या लेना-देना है? एक जिम्मेदार नागरिक का मैंने कर्तव्य निभाया है। ज्यादा बात करने से अच्छा है आप उस घायल की मदद को पहुंचें। अपूर्वा ने झुंझलाते हुए जवाब दिया।

प्‍लीज मैडम आप बुरा न मानें क्या करें। हमारी भी कुछ मजबूरियां हैं। वैसे आपने कितने देर पहले उस व्यक्ति को देखा था?

मैं वहां से गुजरी तब कोई दोपहर के तीन सवा तीन बज रहे थे।
अब क्या समय हो रहा है?
साढ़े पाँच बजे हैं।
आप क्या समझ रही हैं वह अभी तक जिंदा होगा ?

मैं कुछ कह नहीं सकती। हालांकि उसकी स्थिति बहुत गंभीर थी। आप मालूम तो कीजिए, संभव है वह जिंदा हो।

खैर सूचना देने के मैडम आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। वैसे आप अपना नाम बता देती तो कोई हर्ज भी नहीं था। हम घटनास्थल पर पहुंच रहे हैं। और कोई खास बात हो तो बताइए।

मुझे और कुछ नहीं कहना कहते हुए अपूर्वा ने रिसीवर नीचे रख दिया। अपने अंतिम वाक्य के साथ ही अपूर्वा ने एक लंबी सांस ली। उसे लगा जैसे उसके मन पर छाए काले बादल छंट गए हों। उसने एक जागरूक नागरिक होने का कर्तव्य निभाया है। काश, वह उस समय उसकी हाथोंहाथ मदद कर पाती। उसे अपने पति सुमंत पर आज बहुत गुस्सा आ रहा था । अपनी कार को उस घायल पड़े आदमी के पास से ऐसे निकाला जैसे वह कोई भूत हो। जरा भी मन नहीं पसीजा। इंसानियत भी कोई चीज है। उसने कितना कहा था कि गाड़ी रोको, मगर सुमंत ने उसकी एक भी नहीं सुनी। गाड़ी को दौड़ाए चले आए। कल सुमंत के साथ वह अपनी पीहर गई थी। रात में वहां एक शादी समारोह में भाग लिया था। सुबह अपनी सहेलियों से मिलने-जुलने के बाद करीब 12 बजे वह वापस रवाना हो गई थी। सुमंत के साथ वह रवाना हुई तो पूरा परिवार उसे विदाई देने के लिए मौजूद था। माँ की ऑंखें भर-भर आई थीं। जब वे लोग पाली के करीब पहुंचे तो अपूर्वा ने सुमंत से कहा - च्माताजी के मंदिर पर दर्शन करते हुए चलेंगे। रतनपुर में कार रोका। माता के मंदिर पर दर्शन करने के बाद वे बिलासपुर के लिए रवाना हुए थे। रतनपुर से कुछ आगे जब उनकी कार कोनी के करीब पहुँची तो अपूर्वा ने देखा सड़क पर एक आदमी लेटा हुआ है। कार जब उस आदमी के करीब पहुँची तो मालूम हुआ कि वह कोई एक्सीडेंट का मामला है।

वह व्यक्ति औंधे मुँह सड़क पर गिरा हुआ था। उसके सिर से तेजी से खून बह रहा था। तथा वह बिन पानी की मछली की तरह तड़प रहा था। उसकी पगड़ी सड़क पर दूर पड़ी थी। सड़क दूर-दूर तक सूनी पड़ी थी। उस घायल की वहां मदद करने वाला कोई नहीं था। अपूर्वा ने मामले की गंभीरता को समझा तो सुमंत से कहा - च्लगता है एक्सीडेंट हो गया है। आप गाड़ी रोकिए। हमें इसकी मदद करनी चाहिए। देखो तो कितना खून बह रहा है? सुमंत ने कहा - च्पागल मत बनो। एक्सीडेंट का लफड़ा है। इसकी मदद के चक्कर में हम मारे जाएंगे। आजकल भलाई का जमाना नहीं है। कल कोई नई मुसीबत खड़ी न हो जाए? अपूर्वा ने कहा - च्प्लीज, सुमंत कार रोको। तुम पढ़े-लिखे हो कर यह क्या बात कर रहे हो? हम शिक्षित लोग हैं। हमें इस घायल की मदद करनी चाहिए। देखो तो सिर से कितना खून बह रहा है? सुमंत ने कहा - च्तुम चुपचाप बैठी रहो। बेकार के झमेले में मैं नहीं पड़ता। अभी तक पुलिस से कभी तुम्हारा वास्ता नहीं पड़ा है। मैं जानता हूँ। पुलिस ऐसे मामलों में आदमी के साथ क्या-क्या बरताव करती है। हमारी भलाई तो कोई देखेगा नहीं, उल्टे कहेंगे कि हमने ही एक्सीडेंट किया है। कल को यह रास्ते में मर खप गया तो हमारी खटिया खड़ी हो जाएगी। कोई हमारी बात भी नहीं सुनेगा। और अपूर्वा चाह कर भी उस घायल की मदद नहीं कर पाई। घर पहुँचते-पहुँचते उसकी बेचैनी बढ़ती ही गई। सुमंत जब अपने ऑफिस चले गए तो उसने पुलिस कंट्रोल रूम से उस दुर्घटना स्थल के थाने के बारे में मालूम किया।

संबंधित थाना कोनी था। उसने पुलिस सो सूचित किया, तब जा कर उसका मन हलका हुआ। रात को खाने के समय जब वह सुमंत के साथ बैठी तो उसका मन खाने में नहीं लगा। उसकी ऑंखों के आगे उस घायल व्यक्ति का चेहरा बार-बार घूम रहा था। पता नहीं पुलिस समय पर वहां पहुँची भी या नहीं। अगर पुलिस वहां पहुँच भी गई होगी तो क्या वह तब तक जिंदा रहा होगा? यह समझ नहीं पा रही थी कि लोग इस प्रकार के मामलों में हाथ डालने से क्यूं डरते हैं? जहां तक पुलिस की बात है, वह कोई आदमी को खा तो नहीं जाएगी? खानापूर्ति तो पुलिस को करनी ही पड़ती है। यूं सोचते-सोचते पूरी रात अपूर्वा की ऑंखों ही ऑंखों में कट गई। अंतिम पहर में उसकी थोड़ी सी ऑंख लगी। सुबह ऑंख खुलते ही अपूर्वा की ऑंखों के सामने फिर वही दृश्य छा गया। वह तेजी से उठी और दरवाजे पर जा कर देखा, अखबार आ गया था। उसने फुर्ती से अखबार पर नजरें दौड़ाई। अचानक एक जगह पर उसकी नजर ठहर गई। उसकी नजर तेजी से उस खबर पर फिसलती चली गई। हैडिंग था - च्सड़क दुर्घटना में ग्रामीण की मौत... आगे पूरी खबर पढने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। बुझे-बुझे मन से वह अपने कमरे में लौटी तो धड़ाम से पलंग पर गिर पड़ी। अचानक आवाज सुन कर सुमंत की ऑंख खुल गई। उसने पूछा - च्क्या हुआ? अपूर्वा ने कहा - च्वह मर गया। सुमंत - च्कौन, कौन मर गया?अपूर्वा - च्वह कल वाला आदमी। सुमंत - च्तुम्हें किसने बताया। अपूर्वा - च्अखबार में खबर छपी है। सुमंत - च्ओह, तुमने तो मुझे डरा दिया। अपूर्वा - च्तुम्हें कुछ फीलिंग नहीं हो रही है? सुमंत - च्किस बात की? अपूर्वा - च्हम उसकी मदद करते तो वह शायद बच जाता। सुमंत - च्प्लीज अपूर्वा... तुम उस बारे में इतना सोच-सोच कर अपना दिमाग खराब मत करो... वास्तव में बहुत बड़ी भूल कर बैठा था... मगर अब क्या हो सकता है? शव का पोस्टमार्टम सिम्स अस्पताल में ही होगा। हम वहां चलते हैं, उसके घर वालों की कुछ मदद कर सकें? कुछ ही देर में तैयार हो कर दोनों अस्पताल पहुँच गए। पुलिस के दो-चार लोग वहां खड़े मिल गए। सुमंत ने अपना परिचय देते हुए कल की पूरी बात बताई तो थानेदार ने अपूर्वा की तरफ देखते हुए पूछा, च्कल फोन आपने किया था? अपूर्वा – जी हां, वह फोन मैंने ही किया था।

आपका फोन आते ही हमने दो सिपाहियों को रवाना कर दिया था। सिपाहियों के वहां पहुँचने तक वह घायल वहीं तड़प रहा था। अगर उसे अस्पताल पहुँचाने में जरा भी देर हो जाती तो वह वहीं मर जाता। आपने एक आदमी की जान बचा कर बड़ा उपकार किया है। आपकी तरह हर आदमी अपना कर्तव्य निभाने की सोचे, तो पुलिस की परेशानियां तो यूं ही कम हो जाएंगी। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। सुमंत और अपूर्वा थानेदार की बात सुन कर सन्न रह गए। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि थानेदार किसकी बात कर रहे हैं? अपूर्वा - च्आप किसकी बात कर रहे हैं? कौन बच गया? अखबार में तो खबर कुछ और ही छपी है? थानेदार - च्ओह तो आप क्या समझ रहे थे। अपूर्वा - च्हम तो समझे... अखबार में खबर भी तो छपी है। थानेदार - वह एक दूसरी घटना की खबर है। आपने जिस आदमी के बारे में हमें सूचना दी थी, वह तो जिंदा है। वह मेल वार्ड में भर्ती है। आप लोग चाहें तो उससे मिल सकते हैं। वह पत्नी के आगे नतमस्तक हो गया। दोनों अपनी कार में घर लौट रहे थे तब अपूर्वा के अधरों पर एक विजेता सी मुस्कराहट थी।