दोहे

एकांत के दोहे

नरेन्द्र सिंह परिहार

यौवन की कस्तूरी ने दे दी तेरी गंध।
मन पागल हुआ बोला, पीने दे मकरंद॥

ऐसी सुरभि को बिखरा, जाओ न तनिक दूर।
पर आलिंगन लालसा, करो न चकनाचूर॥

बाब कट इन केशों से, दमका तेरा रूप।
मैं तेरी छाया बनूं, तू मेरी धूप॥

तनखाह ने बदल दिया, गोरी का व्यवहार।  read more »

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