हबीब साहब, नाटय भाषा की जीवंतता की दृष्टि से आप भाषा के किस रूप को अधिक प्रामाणिक एवं सार्थक मानते हैं ?
स्कूलों-कॉलेजों में शासकों की भाषा पढ़ी-पढ़ाई जाती है। वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासकीय शब्दावली इसी से बनती है। जनजीवन की भाषाबोली शासितों की भाषा होती है। आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक नीतियों के कारण इनका समुचित या कि अपेक्षित विकास नहीं हुआ। फिर भी, ये उपभाषाएँ या बोलियाँ अधिक रचनात्मक हैं। ताजी, जीवंत, समृध्द और बिंबात्मक।
विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी और नीर (अकबराबादी) इन्हीं उपभाषाओं की ही देन हैंऑफिशियल भाषा की नहीं। दिल्ली में लिखने और बोलने में फर्क हैअंग्रेजी में नहीं है। साहित्य, कला और रंगमंच के मौलिक विकास के लिए क्षेत्रीयता पर बल दिया जाना चाहिए।
समकालीन शहरी रंगमंच पर भी लोक-नाटय शैलियों का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। संगीत नाटक अकादमी के प्रोत्साहन से तथा आप, बेश्त और ब. व. कारंत जैसे वरिष्ठ निर्देशकों के प्रभाव से शहरी लोक रंगमंच का व्यापक विस्तार इस बीच हुआ है। 'फोंक' को 'फेंक कहकर इसका मजाक भी अकसर उड़ाया जाता है। इस संदर्भ में आपकी क्या प्रतिक्रिया है ? read more »