साक्षात्‍कार

मैंने साम्प्रदायिक एकता पर बल दिया है

वरिष्ठ प्रगतिशील कवि डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया से डॉ. राजेश कुमार की बातचीत

मैं डॉ. मलखान सिंह सिसौदिया के आवास पर एटा पहुँचा। उनसे मिलने के लिए मैंने डोर बैल बजाई। अन्दर से श्रीमती गार्गी देवी (सिसौदिया जी की पत्नी) ने कमरे का दरवाजा खोला। मैंने उनके चरण छुए, उन्होंने मुझे बैठने को कहा। मैं सोफे पर बैठ गया। मैंने डॉ. सिसौदिया जी के बारे में पूछा। वे बोलीं - प्रतीक्षा कीजिए, डॉ. साहब अभी आ रहे हैं।

साफ-सुथरे कमरे में टंगा अभिनन्दन-पत्र सिसौदिया जी के कवि-व्यक्तित्व की प्रगाढ़ता को व्यंजित कर रहा था। सिसौदिया जी की कुछ कविताओं का स्मरण कर मैं विचारमग्न हुआ ही था कि सिसौदिया जी ने कमरे में प्रवेश किया।  read more »

सरकारी दबाव से मुक्त हो रंगमंच

हबीब साहब, नाटय भाषा की जीवंतता की दृष्टि से आप भाषा के किस रूप को अधिक प्रामाणिक एवं सार्थक मानते हैं ?

स्कूलों-कॉलेजों में शासकों की भाषा पढ़ी-पढ़ाई जाती है। वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासकीय शब्दावली इसी से बनती है। जनजीवन की भाषाबोली शासितों की भाषा होती है। आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक नीतियों के कारण इनका समुचित या कि अपेक्षित विकास नहीं हुआ। फिर भी, ये उपभाषाएँ या बोलियाँ अधिक रचनात्मक हैं। ताजी, जीवंत, समृध्द और बिंबात्मक।

विद्यापति, कबीर, सूर, तुलसी और नीर (अकबराबादी) इन्हीं उपभाषाओं की ही देन हैंऑफिशियल भाषा की नहीं। दिल्ली में लिखने और बोलने में फर्क हैअंग्रेजी में नहीं है। साहित्य, कला और रंगमंच के मौलिक विकास के लिए क्षेत्रीयता पर बल दिया जाना चाहिए।

समकालीन शहरी रंगमंच पर भी लोक-नाटय शैलियों का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। संगीत नाटक अकादमी के प्रोत्साहन से तथा आप, बेश्त और ब. व. कारंत जैसे वरिष्ठ निर्देशकों के प्रभाव से शहरी लोक रंगमंच का व्यापक विस्तार इस बीच हुआ है। 'फोंक' को 'फेंक कहकर इसका मजाक भी अकसर उड़ाया जाता है। इस संदर्भ में आपकी क्या प्रतिक्रिया है ?  read more »

छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों में विलक्षण प्रतिभा

प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर से महावीर अग्रवाल की बातचीत

रंगमंच हमारी, और राजनैतिक गतिविधियों का हिस्सा बन पाया है या नहीं ? हिन्दी रंगमंच को जीवंत और गतिशील बनाने में आप अपने समकालीन रंगकर्मियों से क्या अपेक्षा रखते हैं ?

रंगमंच हमारी गतिविधियों का हिस्सा नहीं बन पाया है। लेकिन बिल्कुल नहीं बन पाया है, ऐसा भी नहीं है। सामाजिक दृष्टि से कुछ नौजवान काम कर रहे हैं। आर्थिक समस्या के कारण रंगकर्मी फिल्म और टेलीविजन की ओर चले जाते हैं। इसके पीछे उनकी ललक और मजबूरी दोनों छिपी हुई है।

अभिनेता, निर्देशक, गायक, मेकअप मैन और संगीत से जुड़े कलाकार, रंगमंच के आप-पास जितने भी लोग हैं, आर्थिक दृष्टि से सभी रंगकर्मियों की हालत खराब है। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। कुछ रंग ग्रुपों को अनुदान जरूर मिलता है, बाकी की कोई पूछ-परख नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि राजनीतिज्ञ संस्कृति को नहीं समझते हैं। चुनांचे उनकी कोई दृष्टि नहीं है। राजनैतिक गतिविधियों में भी संस्कृति का दखल नहीं है।  read more »

एक्टर बनने निकला था, थियेटर करने लगा

- आलोक प्रकाश पुतुल

हबीब तनवीर अब जब नहीं हैं तो उनके बारे में कई बातें याद आ रही हैं। रायपुर वाले घर में खाने की मेज के पास बैठ कर सिगार फूंकते हुए या रिहर्सल के दौरान किसी के खराब अभिनय पर अफसोस करते हुए या बातचीत करते समय सवालों को तौलने वाले अंदाज में चश्मे के पीछे से देखते हुए... दिल्ली-6 देखते हुए जब 'सास गारी देवे' के शब्द कान में पड़े तो मुंह से निकल गया- हबीब तनवीर, लगा कि इस बार हबीब साहब अपने घर आएंगे तो उनसे लंबी बातचीत की जाए।

उनके जल्दी ही रायपुर आने की खबर मिली। लेकिन वे रायपुर नहीं आ पाए। खबर आई कि अस्पताल में भर्ती हैं। फिर एक दिन सुबह-सुबह उनके देहावसान की खबर... फिल्म ब्लैक एंड व्हाईट के वे दृश्य आंखों के सामने आ गये, जिसमें हबीब साहब सफेद कफन में लेटे हुए थे। तो क्या यह जिन्दगी के नाटक का रिहर्सल था?  read more »

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